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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यस्याज्ञानात्मनोऽज्ञस्य देह एवात्मभावना । उदितेति रुषैवाक्षरिपवोऽभिभवन्ति तम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले इन्द्रियो पर विजय पाने की सामर्थ्य श्रोताओं मे न होने के कारण उन इन्द्र्यो द्वारा आकृष्ट हो रहे मन की पूर्णात्मा में प्रतिष्ठा कैसे होगी ? इस जिज्ञासा को इगितो से ताडकर यस्त्वविज्ञानवान्‌ भवति” तथा यस्तु विज्ञानवान्‌ भवति (५) इन दो युक्तियो के द्वारा प्रतिपादित मार्ग से उक्त जिज्ञासा का क्रमशः परिहार करते हैं। हे श्रीरामजी, जिस अज्ञानी पुरुष को अज्ञानवश देह में ही आत्मभावना उत्पन्न हो जाती है, उस पुरुष को देहात्मभावना के अपराध से उत्पन्न अत्यंत क्रोध से इन्द्रियाँ शत्रु होकर पराजित कर देती हैं