Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
ज्वलति द्वेषदावाग्निर्हृन्मरौ कायतापदः ।
अज्ञमात्सर्यमनसि परापवदनच्छदा ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी के मात्सर्यरूप जल से परिपूर्णं मन
में दूसरे की निन्दारूपी पल्लवो से युक्त, चिन्तारूपी भ्रमरो से शोभित ई््यरूपी कमलिनी भली
प्रकार विलास करती है