Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
नात्मा शरीरसंबन्धी शरीरमपि नात्मनि ।
मिथो विलक्षणावेतौ प्रकाशतमसी यथा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अव देह ओर आत्मा की एकता के भ्रम के निरास के लिए युक्तियाँ बतलाते है ।
श्रीरामजी, जैसे प्रकाश ओर अन्धकार एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण हैं, वैसे ही शरीर ओर आत्मा
एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण हैं, इसीसे आत्मा न शरीर का सम्बन्धी है और न शरीर ही आत्मा में रहता
है यानी जडता ओर चेतनता के कारण अत्यन्त विरुद्ध देह ओर आत्मा का जब आधार आधेयभाव
आदि सम्बन्ध ही दुर्लभ है, तब तादात्म्य सम्बन्ध की तो कथा ही क्या ? यह भाव है