Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, Verses 16–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 60, verses 16–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 16-21
संस्कृत श्लोक
अमरेष्वमरत्वेन नरत्वेन नरेषु च ।
तिर्यक्त्वेन च तिर्यक्षु क्रिमित्वेन क्रिमिस्थितौ ॥ १६ ॥
कालक्रमे कालतया ऋतावृतुतया तथा ।
त्रुटिक्षणनिमेषादौ संस्थितस्तत्तया विभुः ॥ १७ ॥
शुक्ले शुक्लतया जातं कृष्णे कृष्णतया स्थितम् ।
क्रियासु स्पन्दरूपेण नियतौ नियमेन च ॥ १८ ॥
संस्थितः संस्थितौ स्थित्या नाशे नाशतया स्थितः ।
उत्पत्तिरूपेणोत्पत्तावास्थितः परमेश्वरः ॥ १९ ॥
बाल्येन बाल्ये विश्रान्तो यौवने यौवनेन च ।
जरसा च जरारूपे मरणे मरणेन च ॥ २० ॥
इति सर्वपदार्थानामभिन्नः परमेश्वरः ।
कल्लोलसीकरोर्मीणामब्धाविव पयोभरः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर विशेषाकार सत्ता भी वही है, यह कहते हैं।
देवताओं में देवतारूप से स्थित है, मनुष्यों में मनुष्यरूप से । तिर्यक्योनियों में तिर्यग्रूप से स्थित
है और कृमि योनियों में कृमिरूप से स्थित है। काल के क्रम में यानी युग, संवत्सर आदि भेदों में कालरूप
से स्थित है और उसके अवान्तरभेदस्वरूप ऋत्तुओं में ऋतुरूप से स्थित हे । त्रुटि, क्षण, निमेष आदि
अत्यन्त सूक्ष्मभूत कालभेदों में भी वह व्यापक ब्रह्म ही तत्तत् रूप से स्थित है। शुक्ल वस्तु में शुक्लरूप
से स्थित हुआ है और कृष्ण वस्तु में कृष्ण रूप से स्थित है। वह क्रियाओं में क्रियारूप से स्थित है और
दैव में दैवरूप से स्थित है। वह परमेश्वर स्थिति में स्थितिरूप से स्थित है, संहार में संहाररूप से स्थित
है तथा उत्पत्ति में उत्पत्तिरूप से स्थित है। बालरूप में बाल्यरूप से स्थित है, युवा में यौवनरूप से स्थित
है, वृद्धरूप में वार्धक्यरूप से स्थित है एवं मृत में मरणरूप से स्थित है। इस प्रकार सब पदार्थो मे तत्-
तत् रूप से स्थित हुआ वह परमेश्वर सत्तासामान्यरूप से उस तरह उनसे अभिन्न है; जिस तरह समुद्र
में स्थित कल्लोल, जलकण एवं ऊर्मियाँ जलसामान्यरूप से अभिन्न हैं