Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 61, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
स्वप्ने क्षिप्रविनाशित्वं यथा पुंसा न दृश्यते ।
सर्वस्वप्ने तथैवैतद्ब्रह्मणामिह लक्ष्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
शंका हो कि तब प्रजापतियो को तत्त्वज्ञान से स्वयं कल्पित प्रपंच की शीघ्र विनाशिता का अनुभव
क्यों नहीं होता ? तो भोगजनक अष्ट ही उसमें प्रतिबन्धक है, इस आशय से समाधान करते है ।
जिस प्रकार सो रहे पुरुष को स्वाप्निक भोगों के जनक कर्मो से प्रतिरूद्ध होने के कारण स्वप्न में
विद्यमान भी शीघ्रविनाशिता नहीं दीखाई पडती, उसी प्रकार हिरण्यगर्भ के समष्टिस्वप्नरूप इस जगत्
में पद्मजो को विद्यमान शीघ्रविनाशिता का बोध होने में भी भोगजनक अदृष्ट ही प्रतिबन्धक दिखाई
पड़ता है