Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

तत्र बुद्धिरभूत्तस्य रुद्रोऽहमिति निश्चिता । प्रतिबिम्बवदादर्शे द्रागित्येव हि बिम्बिता ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर भगवान्‌ शंकर में ज्ञान, योग, एश्वर्य आदि सम्पूर्णं गुणों का आधिक्य देखने से उस हंस को “मे भी रुद्राहम्भावना से रुद्ररूप हो जाऊँ" यों दृढ़ बुद्धि हो गयी । शंका हो कि जीवन्मुक्त, अतएव वासनाशून्य उस हंस को रुद्रत्व की इच्छा ही केसे होगी ओर उस वासना के अभ्यास से देहत्याग के साथ पुनः उसका रुद्र शरीर धारण भी कैसे होगा ? यदि इस पर कहो कि “भरतस्य त्रिजन्मभिः“ इस न्याय के अनुसार नाना देहो से भोग्य प्रारब्ध कर्मो के अवशिष्ट रहने से वह देहान्तर धारण कर सकता था तो यह ठीक नहीं, क्योकि यहाँ पर रुद्रविषयक अहम्भाव धारण करने का जो वर्णन किया गया है, वह निरुपयोगी हो जायेगा । इसी प्रकार भगवान्‌ रुद्र के ईश्वर होने के कारण रुद्ररूपता में कर्मफलत्व भी नहीं आ सकता ? इस पर कहते है। उसकी वह इच्छित रुद्रता दर्पण में प्रतिबिम्ब की नाई प्रतिषिम्बरूप ही थी । तात्पर्य यह है कि यह वर्णित रूद्रभाव मुख्य रूद्रभाव नहीं है, किन्तु प्रतिबिम्ब के समान सारूप्यमुक्ति ही है और वह कर्मोपासना का फल भी हो सकती है । तथा च, "देवो भूत्वा देवानप्येति" यह श्रुति इस विषय में प्रमाण है