Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 63–64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verses 63–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 63,64
संस्कृत श्लोक
प्रत्येकमुदिते चैते संसारे जीवराशयः ।
चिद्धातोः सर्वगत्वेन त्वसत्याः सत्यवत्स्थिताः ॥ ६३ ॥
यद्यदाखन्यते भूमेस्तत्तन्नाम यथा नभः ।
सर्वगायाश्चितेर्यद्यदुह्यते तत्तथैव चित् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण जीवों के तत्त्वभूत ब्रह्म के साथ ऐक्यलाभ ही ब्रह्म के कल्पित रूपवाले सभी जीवों का
मिलन है, इस आशय से कहते हैं।
(४) इस बीच में उन्हं जो सोये हुए मिले, उनको तो केवल जगाया ओर पूर्वोक्त प्रकार से
स्वात्मरूप बनाया, तथा जो मर गये थे, उन्हें तो जिलाया भी एवं पूर्वोक्त प्रकार से स्वात्मरूप बनाया
यह ऊपर से समझना चाहिए।
प्रत्येक जीव के लिए उत्पन्न हुए संसार में ये जीव समूह, चित्सार ब्रह्म के सर्वव्यापी होने से,
परमार्थतः असद्रूप होने पर भी सद्रूप-से स्थित हैं । पृथ्वी का जो-जो भाग खोदा जाता है, वह सब
जिस प्रकार आकाशरूप से ही अवशिष्ट रह जाता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी इस चिति से जो-जो
तत्त्वज्ञान के द्वारा दूर किया जाता है, अर्थात् मिथ्या समझा जाता है वह सब कुछ एकमात्र चिद्रूप
ही रह जाता हे