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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 66–67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verses 66–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

यच्छालभञ्जिका वृक्षे शैले श्वभ्रे गतेऽन्तकम् । प्रेक्ष्यते तद्वदेकात्मा तथा चिति जगत्स्थितम् ॥ ६६ ॥ अवेदने परे शुद्धे वेदनं यज्जगत्स्थितम् । अकारणमचैतन्यं शून्यत्वेन यथा नभः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके सर्वव्यापी होने ओर वहाँपर सम्पूर्ण पदार्थो की कल्पना करने में दृष्टान्त बतलाते हैं । श्रीरामभद्र, जैसे वृक्ष में, लकड़ी में, पर्वत में या शिलास्तम्भ में शिल्पियों द्वारा टाँकी के छेदन से तत्‌-तत्‌ आकार की प्रतिमा के अनुकूल गड्ढा बनाने पर जब वे वृक्ष आदि पुरुष, हाथी, घोड़े, आदि का आकार परिच्छेद प्राप्त कर लेते हैं तब वे ही-पुरुष आदि विचित्र मूर्तियों के रूप में-हम लोगों को दिखाई देते हैं, वैसे ही एकात्मा सम्पूर्ण जगद्रूप से दिखाई देता है ओर चिद्रूप उस एकात्मा में जगत्‌ भी वैसा ही स्थित दिखाई देता है