Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 64, Verses 1–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 64, verses 1–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 64 · श्लोक 1-13
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
जीवटब्राह्मणादीनां हंसादीनां मुनीश्वर ।
भिक्षुस्वप्नशरीराणां संपन्नं किमतः परम् ॥ १ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रुद्रेण सह संभूय प्रबुद्धाः सर्व एव ते ।
मिथश्च दृष्टसंसारा रुद्रांशाः सुखिनः स्थिताः ॥ २ ॥
तेन रुद्रेण तां मायामवलोक्य यथोदिताम् ।
स्वांशास्तामेव संसारस्थितिं ते प्रेषिताः पुनः ॥ ३ ॥
श्रीरुद्र उवाच ।
गच्छताशु निजं स्थानं तत्र भुक्त्वा कलत्रकैः ।
कंचित्कालं समं भोगान्मत्सकाशमुपैष्यथ ॥ ४ ॥
भविष्यथ मदंशा ये गणा मत्पुरभूषणाः ।
ततो महाप्रलयतो यास्यामस्तत्परं पदम् ॥ ५ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रस्तेषां सोऽन्तरधीयत ।
अन्त्यसंसारसंख्यानं रुद्राणां मध्यमाययौ ॥ ६ ॥
प्रययुः स्वास्पदं तेऽपि जीवटब्राह्मणादयः ।
स्वकलत्रैः समं देहं क्षपयित्वाथ कालतः ॥ ७ ॥
रुद्रलोकं समासाद्य भविष्यन्ति गणोत्तमाः ।
कदाचिद्व्योम्नि दृश्यन्ते तारकाकारकारिणः ॥ ८ ॥
श्रीराम उवाच ।
भिक्षुसंकल्परूपास्ते जीवटब्राह्मणादयः ।
कथं सत्यत्वमायाताः संकल्पार्थे क्व सत्यता ॥ ९ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संकल्पसत्यता त्वंशे त्यज संकल्पसत्यताम् ।
तत्र यन्नास्ति तन्नास्ति यतः सर्वात्म तत्पदम् ॥ १० ॥
यत्स्वप्ने दृश्यते यच्च संकल्पैरवलोक्यते ।
तत्तथा विद्यते तत्र सर्वकालं तदात्मकम् ॥ ११ ॥
तद्देशकालात्मतया गत्वा देशान्तरं यथा ।
देशाद्देशान्तरं यद्वन्न गत्यात्मादिकं विना ॥ १२ ॥
न लभ्यते तथा स्वप्नो विना तत्र न लभ्यते ।
सर्वमस्ति चितः कोशे यद्यथालोकयत्यसौ ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हैँ । श्रीरामभद्र ने कहा : भगवन्, वे जीवट ब्राह्मण आदि, जो एक भिक्षु के संकल्परूप ही थे, केसे
सत्यस्वरूप बन गये ? काल्पनिक अर्थो में सत्यता कहाँ देखी गयी है ? महाराज वसिष्ठजी ने कहा :
भद्र, संकल्प की जो सत्यता है वह तो अधिष्ठानभूत चैतन्यांश में ही है इसलिए विवेकपूर्वक
अध्यस्त अंश में संकल्प की सत्यता छोड दीजिये । सत् ओर असत् से संवलित व्यावहारिक अर्थ
में जो सद्भिन्न रूप पूर्वोत्तर काल में नहीं रहता वही तीनों काल में अस्तित्व से रहित है ओर
अधिष्ठानभूत वह परम पद तो सभी काल में स्थित है, क्योकि वह सर्वात्मक हे । इन सब बातों से
निचोड यह निकला कि भोगजनक अदृष्ट से उत्तेजित उन सांकल्पिक पदार्थों में अधिष्ठान की
सत्यता से ही सत्यत्व है, स्वतः नहीं । आयुष्मन्, जो स्वप्न में दिखाई पडती है और जो संकल्पो
द्वारा दिखाई पडती है वह चैतन्यात्मक वस्तु है; जो कि सब काल में सद्रूप अधिष्ठान होकर तत्-
तत् देश-कालरूप से तत्-तत् स्थान में निरन्तर विद्यमान रहती है । इसमें दृष्टान्त है-जाकर प्राप्त
किया गया देशान्तर । जैसे एक स्थान से दूसरा स्थान यानी मथुरा आदि स्थान से पटना आदि
स्थान-गमन, स्वस्थ मन, चक्षु आदि इन्द्रियों की पटुता, दिवसरूप आदि काल, उपदेष्टा विवेकी
पुरुष आदि हम लोगों की कारण-सामग्री के बिना-उपलब्य नहीं होता, वैसे ही तत्-तत् देश-
कालरूप से परिणत स्वप्न भी जाग्रत् ओर सुषुप्ति या स्वप्नान्तर मेँ कारणसामग्री के बिना उपलब्ध
नहीं होता । चिति के कोश में-कोशसदृश समस्त वासनाओं के भंडार अज्ञान में-सब कुछ भरा पडा
है, इसलिए भोगजनक अदृष्ट से प्रदीप्त हुई वासनाओं द्वारा चिति जिस-जिस रूप से जिस-जिस
वस्तु की कल्पना करती है उस-उस रूप से सम्पूर्ण विषयों को दुश्यरूप से प्राप्त कर लेती हे,
क्योकि वह सर्वात्मक ही तो ठहरी