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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 67, Verses 24–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 67, verses 24–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

न स्पन्दोऽस्तीह नास्पन्दो नैकता वापि न द्विता । शुद्धं चिन्मात्रसर्वस्वं यथैवास्ति तथा स्थितम् ॥ २४ ॥ सारेण तु विचारेण सर्वशब्दार्थयोः समे । चिन्मात्रमेव ज्ञातेयं नास्तीत्यपि न विद्यते ॥ २५ ॥ भेदवेदनयोदेति भेदः प्रकृतिलाञ्छनम् । अभेदबोधादखिले गलिते शिष्यते परम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

वे कल्पित है, यह भी कैसे जाना ? ऐसी शंका होनेपर "तत््वद्ष्टि से दिखाई न पड़ने से ही" यह समाधान करते हैं। हे राघव, तत्त्वदृष्टि से देखने पर न स्पन्द है और न अस्पन्द ही है। न एकत्व है और न द्वित्व ही है। किन्तु शुद्ध एकमात्र चैतन्य स्वरूप जैसा है, उसी रूप से वह स्थित है। उत्तम विचार से सर्वशब्द ओर उसके अर्थों को एकरसस्वभाव जान लेनेपर तो एकमात्र चैतन्य ही परमार्थतः सत्य रह जाता है। उस समय अभावस्वरूप भी यह नहीं रहता, फिर भाव की कथा तो कोसों दूर रही, यह भाव है। भेदबुद्धि से ही मायाकलंकरूप भेद उदित होता है और अभेदबुद्धि से सबके शान्त हो जाने पर तो एकमात्र परब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता हे