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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 29–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 68, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 29-31

संस्कृत श्लोक

सौषुप्तैकसमाधानस्तथा तुर्यसमाधिकः । तुर्यातीतसमाधिर्वा जाग्रत्यपि भवन्ति वै ॥ २९ ॥ तुर्यस्य एव सकलामलशान्तिवृत्तिर्जाग्रत्यपि व्यवहरन्निपुणं समन्तात् । नित्यं सदेह उत वापि विदेह एव ब्रह्मन्नभोभवत एव किलास्ति साधो ॥ ३० ॥ ओंमित्युदस्तभववासनमेकमास्स्व न त्वं न चाहमपि नान्यदिहास्ति सत्यम् । सर्वं च विद्यत इतीह किलान्तराभं ज्ञस्तिष्ठ चिद्गगनकोशकलैकनिष्ठः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

तीन भूमिकाएँ हैं वे जाग्रत ओर स्वप्नावस्था में स्थित भी तत्त्वज्ञानियों को क्रमशः हुआ करती हैं, यह कहते हैं। श्रीरामचन्द्रजी, सौषुप्तैकसमाधि, तुरीयसमाधि या तुर्यातीत समाधि - ये तीनों ही क्रमशः जाग्रत्‌ ओर स्वप्नावस्था में स्थित भी तत्त्वज्ञानी को हुआ करती हैं । ब्रह्मभूत हे साधो श्रीरामभद्र, जाग्रदवस्था में चारों ओर भलीभाँति व्यवहार कर रहा अथवा सब व्यवहारो को छोड कर के समाधि में स्थित हो रहा देहयुक्त भी जीवन्मुक्त सम्पूर्णं निर्मल शान्तिवृत्ति से युक्त तुरीयावस्था में (4) ही स्थित एवं विदेहस्वरूप ही हे । हे श्रीरामजी, यह स्थिति उसीकी है जो स्थूल ओर आकारो के बाघ से निर्मल आकाशस्वरूप होकर स्थित हो गया है अथवा हे श्रीरामजी, यह स्थिति आपकी ही है, क्योकि आप निर्मल आकाशस्वरूप से स्थित हो चुके हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, “ॐ* इत्यादि माण्डूक्योपनिषद्‌ में कही गयी रीति से विराट्‌ आदि पादमात्राओं के प्रविलापन द्वारा सांसारिक वासनाओं का उच्छेद कर आप एक तुरीयपदरूप हो जाइये । इस संसार में न आप, न मैं और न कोई दूसरी वस्तु ही सत्य है । इस संसार मेँ सब कुछ विद्यमान है, यह जो प्रसिद्धि हो चुकी है इसे नाडी के भीतर अनुभूयमान स्वप्न की नाई मिथ्या समझ कर जीवन्मुक्त होते हुए आप चिदाकाशकोश की कला में स्थित हो जाइये