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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 68, Verses 8–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 68, verses 8–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 68 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

वांग्मौनं वचसां रोधो बलादिन्द्रियनिग्रहः । अक्षमौनं परित्यागश्चेष्टानां काष्ठसंज्ञकम् ॥ ८ ॥ मनोमौनं पञ्चमं च तन्मृतौ काष्ठतापसे । भावे सुषुप्तमौनाख्यं जीवन्मुक्तोऽनुजीवति ॥ ९ ॥ त्रिषु मौनविशेषेषु विषयः काष्ठतापसः । सुषुप्तमौनावस्थायां सा तुर्या सैव मुक्तधीः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें प्रत्येक का लक्षण बतलाते हैं। वाणी का निरोध वाणी का मौन, हटात्‌ इन्द्रियों का निग्रह इन्द्रियमोन और चेष्टाओं का त्याग काष्ठसंज्ञक मोन कहलाता है । इस तरह विभाग के पर्यालोचन से यद्यपि पंचम मनोमोन भी संभव है तथापि वह काष्ठतापस, मरण, मूर्च्छा और सुषुप्ति में ही संभव है, अन्य किसी दूसरे काल में नहीं । इसलिए मौनवेत्ताओं ने उसकी गणना अलग नहीं की हे । हे श्रीरामजी, आत्मतत्त्वानुभव में जो जीवन्मुक्त निरन्तर लगा रहता है उसे सुषुप्तमौन कहते है । वाणी का मोन आदि तीनों मोनविशेषो में काष्ठतापस विषय (अधिकृत) है ओर सुषुप्त मौनावस्था में वह जो चतुर्थी अवस्था है वही जीवन्मुक्तो में स्थिति रखनेवाली है यानी वही मुक्तधी कहलाती है