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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

वासनां चित्तमेवाहुः कारणं तद्धि संसृतेः । तदकारणतामेति विलीयोभयकर्मसु ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि उनका फल एक ही है, तो भात की सिद्धि मे आग और जल के समुच्चय के सद्ृश साख्य ओर योग का समुच्चय मानना ही युक्त है, विकल्प मानना युक्त नहीं है; यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो उस पर कहते हैं। बाहर की इन्द्र्यो, अन्तःकरण और प्राण आदि की चेष्टाएँ ही संसार है, उसका वासनापुंजस्वरूप मन ही कारण कहा गया है। वह मन सांख्य या योग दोनों में किसी एक से विलीन होकर तत्त्वज्ञानरूप से परिणत हो करके इन्द्रिय और प्राण दोनों के व्यापारो मेँ अकारण बन जाता है । इस तरह एक-एक से दोनों के फल की सिद्धि हो जाती है; अतः सांख्य और योग-इन दोनों का समुच्चय नहीं है, किन्तु विकल्प ही है, यह भाव है