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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 33–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verses 33–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 33-35

संस्कृत श्लोक

मनः साम्बुरिवाम्भोधौ न शाम्यति सवासनम् । नामनस्काः संभवन्ति प्राणाः सूर्य इव त्विषः ॥ ३३ ॥ न जहाति मनः प्राणान्विना ज्ञानेन कर्हिचित् । तृणान्तरेणैव विना तृणाङ्गमिव तित्तिरिः ॥ ३४ ॥ ज्ञानादवासनीभावं स्वनाशं प्राप्नुयान्मनः । प्राणात्स्पदं च नादत्ते ततः शान्तिर्हि शिष्यते ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए केवल मरण से न मनोनाश होता है अथवा न प्राणनाश ही होता है, यह कहते हैं। जिस प्रकार समुद्र में डूबा हुआ जलयुक्त घट जनों द्वारा न देखा गया भी नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार वासनायुक्त मन कभी भी नष्ट नहीं होता । जिस प्रकार सूर्य किरणों के बिना नहीं रहता, उसी प्रकार प्राण मन के बिना कभी उत्पन्न नहीं होते । ज्ञान के बिना उस प्रकार मन प्राणों को कभी नहीं छोड़ता, जिस प्रकार तित्तिर पक्षी तृण के बिना पहले तृण के अंग को नहीं छोड़ता । तत्त्वज्ञान से अवासनीभावरूप (वासनारहित हो जानारूप) अपने नाश को मन प्राप्त करता है और प्राण से स्पन्द को प्राप्त नहीं करता । परिशेष में शान्ति ही अवशिष्ट रहती है