Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एकस्माद्भगवंश्चित्तात्कथं चित्तशतं कृतम् ।
तत्स्वप्नकृतरुद्रेण दीपाद्दीपशतं यथा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
बोधयित्वा तु तं भिक्षुं चेतसा चेतनेन च“ इत्यादि से भिक्षु के स्वप्नकृत शततम रुद्र द्वारा अपने
चित्त से चैतन्यप्रदान होने से भिश्च आदि का जो बोधन पहले कहा गया है उसका, और कहीं दूसरी
जगह दर्शन न हो सकने से, असम्भावन कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं।
भगवन्, भिक्षु के स्वप्नप्रकृत रुद्र ने एक ही दीप से सौ दीप की नाई एक चित्त से सौ चित्त कैसे कर
दिये ?