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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 42–50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 69, verses 42–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 42-50

संस्कृत श्लोक

प्राणः शरीरविलये प्रयाति व्योमवायुताम् । यथा वासितमेवेदं सर्वं पश्यति तत्र वा ॥ ४२ ॥ यथा विदेहाः पश्यन्ति प्राणा व्योमनि देहकम् । समनस्कास्तथाचारं सर्वं चानुभवन्ति ते ॥ ४३ ॥ शान्ते वातपरिस्पन्दे यथा गन्धः प्रशाम्यति । तथा शान्ते मनःस्पन्दे शाम्यन्ति प्राणवायवः ॥ ४४ ॥ अविनाभाविनी नित्यं जन्तूनां प्राणचेतसी । कुसुमामोदवन्मिश्रे तिलतैले इव स्थिते ॥ ४५ ॥ मनसः स्पन्दनं प्राणः प्राणस्य स्पन्दनं मनः । एतौ विहरतो नित्यमन्योन्यं रथसारथी ॥ ४६ ॥ आधाराधेयवच्चैतावेकाभावे विनश्यतः । कुरुतश्च स्वनाशेन कार्यं मोक्षाख्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥ एकतत्त्वघनाभ्यासाच्छान्तं शाम्यत्यलं मनः । तल्लीनत्वात्स्वभावस्य तेन प्राणोऽपि शाम्यति ॥ ४८ ॥ विचार्य यदनन्तात्मतत्त्वं तन्मयतां नय । मनस्ततस्तल्लयेन तदेव भवति स्थिरम् ॥ ४९ ॥ यदेवातितरां श्रेयोऽनुपलम्भोपलम्भयोः । द्वयोरप्यसतोस्तत्र शेषे वापि स्थिरो भव ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

देह के अस्तित्व में जब प्राण का उत्क्रमण हो तव आपका यह क्रम भले ही रहे परन्तु शाप, छेदन आदि से जब देह का अस्तित्व ही न हो तब कौन-सा क्रम माना जायेगा ? शरीर का विलय हो जाने पर बाह्याकाश में अवस्थित वायु में मिल जाने के कारण प्राण बाह्याकाशस्थ वायुरूप हो जाते हैं और वहाँ पर (बाह्याकाश में) वासनानुसार ही इन सब पदार्थो को देखते हैं । बाह्याकाश में देहशून्य प्राण मनसे युक्त होकर कर्मजनितवासनारूप जिस तरह के पशु-पक्षी, मनुष्य आदि शरीरों को देखते हैं, उसी तरह के व्यवहारों का भी अनुभव करते हैं । जैसे वायु का चलन रूक जाने पर गन्ध रुक जाती है, वैसे ही मन का चलन रुक जाने पर प्राण-वायुओं का चलन भी रुक जाता है । हे रामभद्र, सब प्राणियों के प्राण और चित्त दोनों उस प्रकार एक दूसरे से निरन्तर मिले-जुले रहते हैं, जिस प्रकार आक्रान्त कुसुमसुगन्धवाले तिल और तेल एक दूसरे से निरन्तर मिले-जुले रहते हें । मन का जो चलन है, वही प्राण है और प्राण का जो चलन है, वही मन है, क्योंकि रथ और सारथि की नाई वे दोनों एक दूसरे के स्पन्दन का सम्पादन करते हैं। आधार और आधेय के सदृश अर्थात्‌ अग्नि और उष्णता के सदृश दोनों में से किसी एक का विनाश हो जाने पर मन और प्राण दोनों विनष्ट हो जाते हैं और अपने विनाश के द्वारा वे दोनों एक महान्‌ मोक्षनामक कार्य सम्पादन कर देते हैं । अद्रय ब्रह्मतत्त्व के घनीभूत (दृढ़) अभ्यास से वासनाशून्य हुआ मन पर्याप्तरूप से शिथिल हो जाता है और इससे प्राण भी शिथल हो जाता है, क्योकि प्राण का स्वभाव मन के साथ मिल जाना ही हे । रामभद्र, जो असीम आत्मतत्त्व है उसका विचारकर पहले आप मन को तद्रूप बना डालिये, फिर तो उस आत्मतत्त्व में मन के लय से वह आत्मरूपता ही स्थिर हो जाती है । अज्ञान और अज्ञानवाधक ब्रह्माकारवृत्ति-इन दोनों की भी निवृत्ति हो जाने पर जो अत्यन्त कल्याणरूप चिन्मात्र अवशिष्ट रह जाता है, उस चिन्मात्रस्वरूप अवशेष ब्रह्म में आप प्राणधारण द्वारा स्थिर हो जाइए