Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
पूर्वं गृहीत्वा कर्णाभ्यां स्फुरन्ती परिनिश्चयम् ।
जराजर्जरमार्जारी यौवनाखुं निकृन्तति ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
आरंभकाल में पहले कानों के संनिहित कपोल
प्रदेश का ग्रहण कर चारों ओर से निश्चयपूर्वक स्फुरणशील जरारूपी जर्जर बिल्ली जो यौवनरूपी
चूहों का भक्षण करती है, वह भी अज्ञान का विलास है