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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

अनारतपतज्वालभूतपर्णपरम्परा । स्पन्दते मरुताऽऽमृष्टा संसृतिव्रततिश्चिरम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

निरन्तर पतनों से युक्त पृथ्वी आदि भूतरूपी पत्रपरम्परावली सृष्टिलता जो प्राण-वायु से कम्पित होती हैं, वह भी अज्ञान का विलास है