Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
शतशो विद्रुतारिध्रैर्दनुपुत्रैरमिष्टुताम् ।
भवभग्नतयामैन्द्रीं तनुं वहति वासना ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से अज्ञान का बाध होने पर भी जो वासना अधिकारप्राप्ति के अनुकूल प्रारब्ध के बल से इन्द्र
आदि शरीर, दूसरे मनु के आगमन तक, धारण करती है, उसका दूसरे किस कारण से विनाश प्राप्त
होगा ? इस आशय से दृष्टान्त देते है।
अपने पराक्रमो से सैकड़ों पराजित भी शत्रुओं का फिर युद्ध की अभिलाषा से पालन करनेवाली
दानवपुत्रों द्वारा भी सब प्रकारो से प्रशंसित हुई इन्द्रदेह, जिसका पुनर्जन्म आदि विषय में वेग नष्ट
चुका हे, वासना अधिकारपर्यन्त (मन्वन्तर तक) जो धारण करती है, वह भी अज्ञान का विलास
हे