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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 7, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 7, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 7 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

याः संपदो यदुत संततमापदश्च यद्बाल्ययौवनजरामरणोपतापाः । यन्मज्जनं च सुखदुःखपरम्पराभिरज्ञानतीव्रतिमिरस्य विभूतयस्ताः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

कथित अर्थ का संक्षेप स्पष्टीकरण करते हैं। श्रीरामजी, जो कुछ सम्पत्तियाँ हे, जो कूछ निरन्तर चलनेवाली आपत्तियाँ हैं, जो वाल्य, यौवन, जरा, मरणरूपी महान सन्ताप हैं, जो सुख-दुःख की परम्पराओं में मंजन होता है, वह सब अज्ञानरूपी गाढ अन्धकार की विभूतियाँ हैं