Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 71, Verses 3–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 71, verses 3–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 71 · श्लोक 3-21
संस्कृत श्लोक
तादृशानां सहस्राणि फलानि यत्र सन्ति हि ।
अत्युच्चैस्तादृशी शाखा विपुला चलपल्लवा ॥ ३ ॥
तादृशानां सहस्राणि शाखानां यत्र सन्त्यथ ।
तादृशोऽस्ति महावृक्षो दुर्लक्ष्यो विपुलाकृतिः ॥ ४ ॥
तादृशानां सहस्राणि यत्र सन्ति महीरुहाम् ।
तादृशं वनमत्युच्चैरनन्ततरुगुल्मकम् ॥ ५ ॥
तादृशानां सहस्राणि वनानां यत्र सन्त्यथ ।
तादृगस्ति वृहच्छृङ्गमत्युच्चैर्भरिताकृति ॥ ६ ॥
तादृशानां सहस्राणि श्रृङ्गाणां यत्र सन्त्यथ ।
तादृशोऽस्त्यतिविस्तीर्णो देशो विपुलकोटरः ॥ ७ ॥
तादृशानां सहस्राणि देशानां यत्र सन्त्यथ ।
तादृगस्ति वृहद्द्वीपं महाह्रदनदीयुतम् ॥ ८ ॥
तादृशानां सहस्राणि द्वीपानां यत्र सन्त्यथ ।
तादृगस्ति महीपीठं विचित्ररचनान्वितम् ॥ ९ ॥
तादृशानां सहस्राणि पृथ्वीनां यत्र सन्त्यथ ।
तादृगस्ति महास्फारं महाभुवनडम्बरम् ॥ १० ॥
तादृशानां सहस्त्राणि जगतां यत्र सन्त्यथ ।
तादृगस्ति महच्चाण्डं चण्डमम्बरपीठवत् ॥ ११ ॥
तादृशानां सहस्राणि यत्राण्डानि करण्डकाः ।
तादृशोऽस्ति गतस्पन्दो विपुलाब्धिश्च सागरः ॥ १२ ॥
तादृक्सागरलक्षाणि तरङ्गो यत्र पेलवः ।
तादृशः स्वविलासात्मा निर्मलोऽस्ति महार्णवः ॥ १३ ॥
तादृगब्धिसहस्राणि यस्योदरजलान्यथ ।
तादृशोऽस्ति पुमान्कश्चिदत्युच्चैर्भरिताकृतिः ॥ १४ ॥
तादृशानां नृणां लक्षैर्यस्य मालोरसि स्थिता ।
प्रधानं सर्वसत्तानां तादृशोऽस्ति परः पुमान् ॥ १५ ॥
तादृशानां सहस्राणि पुरुषाणां महात्मनाम् ।
स्फुरन्ति मण्डले यस्य स्वतनूरुहजालवत् ॥ १६ ॥
तादृशोऽस्ति महादित्यः शतमन्यासु दृष्टिषु ।
या एताः कलनाः सर्वास्ता एतास्तस्य दीप्तयः ॥ १७ ॥
अस्यादित्यस्य दीप्तीनां ब्रह्माण्डास्त्रसरेणवः ।
मया चित्सूर्य इत्युक्तः सर्वमेतत्तपत्यसौ ॥ १८ ॥
विज्ञानात्मैव परमो भास्करो भाविताशयः ।
इमे ये भुवनाभोगास्तस्यैव त्रसरेणवः ॥ १९ ॥
विज्ञानपरमार्कस्य भासा भान्ति भवन्ति च ।
इमा जगदहर्लक्ष्म्यः क्वचिल्लक्ष्म्यो रवेरिव ॥ २० ॥
विज्ञानमात्रकचितात्मनि जन्तुजाते त्रैलोक्यमण्डपमणेरविकासभाजि ।
चिज्जन्मनोर्भवनसंभ्रमतावलेखाः सन्तीह रे न हि मनागपि शान्तमास्स्व ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पदार्थो में सत्तास्फूर्ति व्यवहार का प्रवर्तक मायाशबल ब्रह्म-इन चौवह पदार्थों का यहाँ पर क्रम से
फल-शाखा आदि कल्पनाओं द्वारा निर्देश करते हैं।
वैसे हजारों फल जहाँ विद्यमान हैं और उन्हीके अनुरूप चंचल पल्लवों की नाई भुवनो से युक्त
वहाँ पर बड़ी ऊँची एक शाखा है। दस, बीस शाखाएँ नहीं हैँ किन्तु उस प्रकार की बड़ी-बड़ी हजारों
शाखाएँ जहाँ विद्यमान हैं, ऐसा पामरों द्वारा दुर्लक्ष्य विपुलाकृति एक महान वृक्ष है । इसी प्रकार के
हजारों वृक्ष जिसमें हैं ऐसा एक वन है, जिसमें ऊँचे-ऊँचे असीम वृक्ष ओर गुल्म विद्यमान हैं। और
उसी प्रकार के हजारों वन जहाँ पर हैं ऐसा, उन्नत शिखरों से युक्त चारों ओर से परिपूर्ण आकारवाला
एक विशाल पर्वत हे । वैसे हजारों जहाँ पर पर्वत हैं ऐसा अत्यन्त विस्तीर्ण विपुल कोटरवाला एक देश
है। वैसे हजारों देश जहाँ पर विद्यमान हैं ऐसा बड़े-बड़े हद और नदियों से युक्त एक बहुत बड़ा द्वीप
है। वैसे अनन्त द्वीप जिसमें हैं ऐसा एक महीपीठ है, जिसमें चित्रविचित्र नामादिक रचनाएँ विद्यमान
हैं। उस प्रकार के हजारों महीपीठ जिसमें विद्यमान हैं ऐसा एक अत्यन्त विस्तृत महाभुवनरूप प्रपंच
है। उस तरह के असंख्य महाभुवन जिसमें विद्यमान हैं ऐसा विस्तृत आकाशपीठ के सदृश एक महान
प्रचण्ड अण्डा है। इस-इस तरह के असंख्य अण्डरूपी करण्डक जिसमें विद्यमान हैं ऐसा एक
चंचलतारहित असीम जलनिधि-एक सागर है । उस तरह के लाखों सागर जिसमें कोमल तरंगरूप
हैं, ऐसा एक अपने स्वरूप में विलास करनेवाला निर्मल महार्णव है । उस प्रकार के हजारों महार्णव
जिसके उदर के जलरूप हैं, ऐसा एक कोई बड़ा भारी परिपूर्णाकृति पुरुष (विष्णु) है। ऐसे-ऐसे लाखों
पुरुषों की माला जिसके वक्षःस्थल में अवस्थित है ऐसा एक परम पुरुष (रुद्र) है, जो सब सत्ताओं
का प्रधान यानी आधारभूत अधिष्ठान है । इस प्रकार के महान् आत्मशाली असंख्य पुरुष जिसके
मण्डल में शरीररोमजाल के (५) सदृश स्फुरित हो रहे हैं, ऐसा एक महान् आदित्य है । पराग् दुष्टिवाले
जीवों मे रुद्र से लेकर ब्रह्माण्डपर्यन्त होनेवाले जो कोटि-कोटि प्रतिभास हैं ये ही सब प्राणियों को
प्रत्यक्ष इस आदित्य की रश्मियाँ हैं इसी आदित्य की दीप्तियों के ब्रह्माण्ड ही त्रसरेणु हैँ । मेने तुमसे
जिस सूर्य का कथन किया था वह यही चित्सूर्य है ओर इसके प्रभाव से सारा जगत् प्रकाशित होता
है । हे वेताल, पूर्वोक्त असंख्य पदार्थ जिससे प्रकाशित होते हैं, ऐसा विज्ञानस्वरूप परमसूर्य है ओर
ये जो विस्तृत ब्रह्माण्ड हैं, वे उसी सूर्य के त्रसरेणु हैं । सर्वोत्तम विज्ञानरूपी सूर्य की दीप्ति से ही,
कहीं साधारण सूर्य से दिनलक्षिमयों के सदुश, ये जगद्रूप दिवालक्षिमयाँ स्फूर्तिं और सत्ता प्राप्त करती
हैँ । हे वेताल, मैने जिस मायाशबल ब्रह्म का वर्णन किया है, उस त्रैलोक्यमण्डपमणि के (सूर्य के)
पारमार्थिक स्वरूपभूत, मुख्य अधिकारियों में शास्त्रजनित अखण्डाकार साक्षात्कारमात्र द्वारा
(&) जैसे साधारण पुरुष के शरीर में उत्पद्यमान रोम अत्यन्त छोटे हैँ, उनके स्वल्पतम परिमाण
की शरीर-परिमाण से तुलना नहीं हो सकती, ठीक वैसे ही व्यापकशरीर आदित्यवत् प्रकाशमान
आत्मा से उत्पद्यमान असंख्य पुरुष रोम के सदृश अत्यन्त छोटे हैँ, उनके परिमाण की उस आत्मारूपी
आदित्यपरिमाण से तुलना नहीं हो सकती, यह बतलाने के लिए “स्वतनूरुहजालवत्” कहा । श्रुति
भी है-“यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीहविश्वम्“ जैसे जीवित चेतन पुरुष से अचेतन
केश उत्पन्न होते हैं, वैसे ही अक्षर चेतन से अचेतन केशवत् विश्व उत्पन्न होता है ।
स्वात्मरूप से प्रकाशित हो रहे, अनधिकारी जन्तु ओं में स्पष्टरूप से प्रकाशित न हो रहे इस प्रत्यगात्मा
में, चिनगारियों के सदूृश काल्पनिक जीव जगत् की पृथक् सत्ता और कर्तृत्व-भोक््तृत्व आदि असंख्य
संभ्रमों के उल्लेख हे । वास्तव में परमार्थदृष्टि से तो तनिक भी परमात्मा में भ्रम का अवकाश नहीं है,
इसलिए तुम निरर्थक प्रश्नों का आडम्बर छोड़ दो