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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 72, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

जगदाख्ये महास्वप्ने स्वप्नात्स्वप्नान्तरं व्रजत् । रूपं त्यजति नो शान्तं ब्रह्मशान्तत्वबृंहणम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नात्‌ स्वप्नान्तरं गच्छन्‌“ इत्यादि तृतीय प्रश्न का उत्तर कहते हैं। जगत्‌'नामक महास्वप्न में एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न मेँ जा रहा तत्‌-तत्‌ स्वप्नगत दोषों से शून्य अर्थात्‌ असंगज्योतिरूप ब्रह्म बोधमात्र से ही शान्तत्व को बढ़ानेवाले अपने रूप को नहीं छोडता