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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 72, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 72, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 72 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

सद्ब्रह्मात्मादिभिः शब्दैर्यदेताभिर्विगीयते । शून्यमव्यपदेशं ते न तत्किंचिच्च किंचन ॥ ५ ॥ या या विभाव्यते सत्ता सा सानुभवनिर्मितान् । रम्भास्तम्भवदेतावच्चिन्मात्रममलं ततम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

आदि शब्दों का विषय है, वस्तुतः वह सब धर्मों से शून्य होने के कारण सत्‌, ब्रह्म आत्मा आदि शब्दों का विषय नहीं है । विवर्तभूत जगत्‌ आदि में निमित्त होने पर वह परमात्मा सत्‌, ब्रह्म, आत्मा आदि शब्दों से कहा जाता है और सर्वधर्मातीत होने से “शून्यम्‌, अव्यपदेश्यम्‌" आदि शब्दों से कहा जाता है, इसलिए कुछ है और कुछ नहीं भी है यानी विषय और अविषय दोनों है। अतएव पटसत्ता तन्तुसत्ता में, तन्तुसत्ता कपास की सत्तामें, कपास की सत्ता कपास के फल की सत्ता में, फल की सत्ता गुल्म की सत्ता में और गुल्म की सत्ता बीज, मिट्टी, जल आदि की सत्ता में पर्यवसित होती है-इत्यादि क्रम से जो-जो सत्ता विभावित होती है यानी जिस-जिस सत्ता की भावना की जाती है वह सब तत्‌-तत्‌ अनुभव से निर्मित आकारों को छोड़कर अन्त में केले के स्तम्भ के तुल्य तत्‌-तत्‌ अनुभवरूप चिन्मात्र में ही पर्यवसित होती है, इसलिए जगदाकार से वही एक निर्मल चिन्मात्र वस्तु विस्तृत हुई हे