Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 74, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 74, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 74 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
भगीरथ उवाच ।
चिन्मात्रं निर्गुणं शान्तमस्ति निर्मलमच्युतम् ।
देहादि नेतरत्किंचिदिति वेद्मि मुनीश्वर ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यों गुरु द्वारा उपदेश ग्रहण कर चुके राजा भगीरथ विवेक से अपने-आप आत्मतत्व का हृदय में
पयालोचन करके आपाततः निश्चय कर उसमें विक्षेप होने के कारण चित्त की स्थिति न प्राप्त कर रहे,
जिस अंश का उन्हे ज्ञान हो गया था उसे गुरुजी को निवेदन करके उसके स्फुट होने के तथा उसमें जो
विक्षेप पड़ता है उसकी शान्ति मे उपाय पूछते हैं।
भगीरथ ने कहा : हे मुनीश्वर, यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि चिन्मात्र, निर्गुण, शान्त, निर्मल
ओर अच्युत आत्मा है तथा देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अविद्यापर्यन्त अन्य कुछ भी आत्मा नहीं
है - यह भी आपके वचन में विश्वास होने तथा अपने अनुभव से मैं जानता हूँ