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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verses 15–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verses 15–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 15-22

संस्कृत श्लोक

मनोमातङ्गविधुता संकल्पकलकोकिला । इन्द्रियव्यालसंबाधा तृष्णात्वगुपरञ्जिता ॥ १५ ॥ नीलाकाशतमालाङ्गसंश्रयेणोन्नतिं गता । रोदसीजानुसुस्तम्भा भुवनोद्यानभूषिता ॥ १६ ॥ अधोब्रह्माण्डखण्डेषु स्वालवालेन जालिता । विधृताशेषजलधिजलक्षीरादिसेचना ॥ १७ ॥ त्रयीविलोलभ्रमरा रमणीपुष्पपुञ्जिका । चित्स्पन्दवातचलिता क्रियाविपुलपुत्तिका ॥ १८ ॥ कुकर्माजगरव्याप्ता स्वर्गश्रीपुष्पमण्डपा । जीवजीवननीरन्ध्रा नानामोदमदप्रदा ॥ १९ ॥ नानोपशमवैचित्र्यनानाकुसुमभासिनी । नानाफलावलीव्याप्ता नानावर्षविकासिनी ॥ २० ॥ नानालवालवलया नानाविहगधारिणी । नानापरागपरुषा नानाभूधरजालिका ॥ २१ ॥ नानाकलाकुड्मलिनी नानावनगणोत्थिता । नानागिरितटारूढा नानादलनिरन्तरा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह लता चित्तरूपी हाथी से प्रकम्पित, संकल्परूप मधुर कलनाद करनेवाली कोकिल से युक्त, इन्द्रियरूपी साँपों से वेष्टित और तृष्णारूपी चमड़े से आच्छादित, नील आकाशरूपी तमालवृक्ष के अवयवों के आश्रय से अत्यन्त विस्तार को प्राप्त, आकाश और पृथिवीरूप चारों ओर को जानुतुल्य संकुचित मूलस्तम्भों से युक्त, चतुर्दश भुवनरूपी वाटिकाओं से शोभित; सात समुद्रों की खाईरूपी सुन्दर आलवाल से आवृत एवं सम्पूर्ण समुद्रों के जल, क्षीर आदि से सिंचित होकर ब्रह्माण्डखण्डों के अधोभाग में विस्तृत जड़ों से बद्ध; काम्य कर्मो के बोधक तीनों वेदों से चंचल हुए कामीरूप भ्रमरों से युक्त, अतएव उन कामी जनों के भोग्यभूत स्त्रीरूप पुष्पसमूहों से शोभित, मनके स्पन्दरूप वायु से कम्पित, स्वाभाविक प्रवृत्तिवाले विपुलजनसमूहरूपी मूल, पत्र, काण्ड आदियों में भ्रमण कर रहे सूक्ष्म कीटों से युक्त, शास्त्रनिषिद्ध कर्मरूपी अजगर से व्याप्त, स्वर्ग की श्रीरूपी पुष्पमण्डप से शोभित तथा जीवों के जीवनोपायों से पूर्ण है। (इस सृष्टिरूप लता में प्रसिद्ध लता से विलक्षण अन्यान्य भी अनेक तरह के वैचित्र्य हैं, यह दिखलाते हैं- “नाना” से ।) अनेक प्रकार के विषयवासनारूप गन्धो से अज्ञों को मत्त करनेवाली, विवेकियों के लिए तो अनेक प्रकार के उपशम-वैचित्र्यरूपी अनेक पुष्पों से प्रकाशमान, अनेक प्रकार के फलों की पंक्तियों से व्याप्त अनेक प्रकार के पुष्प एवं फलों के रस तथा पराग से विकसित, विभिन्न-विभिन्न आलवालों से (खाईयों से) वेष्टित, तरह-तरह के पक्षियों से युक्त, अनेक तरह की धूलियों से युक्त होने के कारण रूखी, नाना प्रकार के पर्वतरूप जालों से बद्ध, अनेक कलारूप कलियों से युक्त, अनेक वनसमूहों से ऊपर को उठी हुई, अनेक पर्वतों के तटोंपर आरूढ़ हुई तथा सदा अनेक प्रकार के दलों से शोभित हे