Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
यत्किंचनाङ्ग भुवनेषु महामहिम्नाव्याप्तं जरत्तृणलवत्वमुपागतं वा ।
दृश्यं स्फुरन्ननु हराद्यपि तामविद्यां विद्धि क्षयाय तदतीततयात्मलाभः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं विष्णुरूपा है, कहीं ब्रह्मारूपा है, कहीं रुद्ररूपा है, कहीं सूर्यरूपा है, कहीं अग्निरूपा है,
कहीं वायुरूपा है, कहीं चन्द्ररूपा है तो कहीं यमरूपा है ॥ ३ १॥
हे श्रीरामजी, इन समस्त भुवनो में उत्कृष्ट प्रभाव से चारों ओर व्याप्त हुए समस्त पदार्थो का
संहार करनेवाले महादेव से लेकर अव्याकृतपर्यन्त अथवा अल्प प्रभाव के कारण जर्जर तृणरूपता
को प्राप्त हुआ जो कुछ यह दृश्य प्रस्फुरित हो रहा है, उस सबको तत्त्वज्ञान द्वारा बाध करने योग्य
अविद्यास्वरूप ही समझो, उसका अतिक्रमण अर्थात् बाध हो जाने पर आत्मा का लाभ यानी मोक्ष
अवश्य प्राप्त होता है