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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 8, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सुखादविद्योदेत्युच्चैस्तदेवान्ते प्रयच्छति । दुःखादविद्योदेत्युच्चैस्तदेवैषा फलत्यलम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सुख आदि में मूलरूपत्व तथा फलरूपत्व का उपपादन करते हैं। अनुभूयमान सम्पत्ति आदि सुखो से “आगे भी मुझे इससे अधिक सम्पत्ति प्राप्त होवे" एसी रागस्वरूप अविद्या दृढ़तापूर्वक उत्पन्न होती है और वह अविद्या यज्ञ, दान आदि धर्मो द्वारा अन्त मेँ सुखरूप फल प्रदान करती ही है, दारिद्रय आदि दुःखों से धन की तृष्णा आदिरूप अविद्या दृढतया उत्पन्न होती है ओर वह पापवासना से दुष्परतिग्रह, चौरी आदि अधर्मो में प्रवृत्ति द्वारा उससे भी अधिक दुःख रूप फल प्रदान करती ही है