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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । त्रिविधं संभवत्यङ्ग साध्यं वस्त्विह सर्वतः । उपादेयं च हेयं च तथोपेक्ष्यं च राघव ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

रामभद्र, जो आपने क्रिया की उत्पत्ति के विषय में आत्माश्रय, अनवस्था आदि दोषों का उद्वावन किया है वह तब घटता, जब केवल क्रियास्वरूप की सिद्धि के लिए कारकों की अपेक्षा होती । परन्तु यहाँ बात वैसी नहीं है । बात यह है - क्रियासाध्य फल के लिए कारकों की अपेक्षा होती है । फल की उत्पत्ति के लिए प्रवृत्त हुए कारक नान्तरीयकरूप से क्रिया का अवलम्बन करते है । इसी क्रिया के आधारपर फल में साध्यता और कारकों में साधनता कही जा सकती है । इस रीति से निष्कर्ष यह निकला कि साध्य और साधन दोनो से विलक्षण क्रिया साध्य में अपेक्षित साधनों से भिन्न किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं करती, इसलिए क्रिया में सक्रिय कारण है या कूटस्थ ? इस विकल्पका प्रसंग ही नहीं आता, इस आशय से वसिष्ठजी आगे के प्रश्नो के समाधान में गौण-मुख्यसाधारण क्रियासाध्य को विभाग पूर्वक दशति हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे प्रिय राघव, इस जगत्‌ मेँ सभी जगह साध्य वस्तु तीन तरह की होती है - उपादेय, हेय ओर उपेक्ष्य (५)