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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

गुटिकाञ्जनखङ्गादिक्रियाक्रमनिरूपणम् । तत्रासतां च दोषोऽत्र विस्तारः प्रकृतार्थहा ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, हमने वैसा मान लिया, इससे प्रकृत में क्या आया, इस पर कहते हैं। उड़ामरतन्त्र, योगिनीकल्प आदि बड़े-बड़े अनेक ग्रन्थों में आकाशगमन आदि के साधन ये भी प्रसिद्ध है - सिद्धगुटिका, सिद्धांजन, सिद्धखड्ग, सिद्धपादुका आदि | "कथं संसाधयत्येतत्‌" यह जो आपने प्रश्न किया है उसका अभिप्राय यदि उन क्रियाक्रमों का निरूपण करने में है, तो अविस्तृत कथन से उनका निरूपण न हो सकने के कारण कथन का विस्तार अवश्य करना होगा। उससे सिद्धियों के विषय में जिज्ञासा न रखनेवाले अतत्त्वज्ञ श्रोताओं की दैववश इच्छा हो जायेगी और उनमें वे प्रवृत्ति करने लग जायेंगे, इससे बड़ा अनर्थ हो जायेगा । आपके लिए भी वह विस्तार प्रकृत आत्मश्रवण में विघ्नरूप हो जाने से विघातक ही है, इसलिए प्रकृत में उसका निरूपण उचित नहीं है