Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
किंचित्त्यक्त्वा नकिंचिद्यो गतो प्रत्यक्षसंस्थितम् ।
त्यक्तप्रत्यक्षसद्रूपः स कथं किल शोभते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
'नाकिंचित् किंचिदा. ' इत्यादि वाक्य में असम्बद्धप्रलापत्व बतलाते हैं।
भद्रे, बतलाओ तो सही, जो वस्तु आकारसामान्य का परित्याग कर कभी प्रत्यक्ष न होनेवाली
निराकारता को प्राप्त हो चुकी है, वह प्रत्यक्ष और अस्तित्व से शून्य वस्तु कैसे शोभित हो सकती है ?