Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वत्र सर्वदा सर्वं चित्संविद्विद्यतेऽनघ ।
किंत्वस्या भूततन्मात्रवशादभ्युदयः क्वचित् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जब देशकृत परिच्छेद का अभाव वस्तुकृत परिच्छेद के अभाव में अन्तभूत है तब तो कालकृत
परिच्छेद के अभाव भी वस्तुकृत परिच्छेद के अभाव में अन्तर्भूत ही है, फिर उसका पृथक् उपादान
व्यर्थ है । यदि यह कहिये कि स्पष्टीकरण के लिए उसका अलग उपादान किया गया है, तो देशकृत
परिच्छेद का अभाव में भी यह कह सकते हैं - यों तीनों के अनुवाद के व्याज से दिखलाते हुए,
निराकार और निर्विषयक चिति की-जीवाकारस्वरूप से या घटादि विषयकस्वरूप से-अभिव्यक्ति
बतलाने के लिए "तदा संविदुदेत्यन्तर्भूततन्मात्रवीजभूः“ इत्यादि जो पहले कहा गया था उसी अर्थ
की विस्तार से व्याख्या करने की इच्छा कर रहे महाराज वसिष्ठजी - स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहो
के आकार में परिणत भूतो से सापेक्ष ही चिति की विशेषाभिव्यक्ति होती है यह बतलाते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप रामजी, यद्यपि सब जगह सदा चितिसंवित् ही सब कुछ है,
तथापि भूततन्मात्राओं के कारण इसका उदय कहीं पर ही होता है