Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
क्वचिन्नष्टं क्वचित्स्पष्टं क्वचिदुच्छन्नतां गतम् ।
वस्तु वस्तुनि दृष्टं तत्तत्सद्भावैर्विजृम्भितम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
वह चितिवस्तु कहीं मिट्टी, पत्थर आदि वस्तुओं में अविद्यारूपी जडता से
तिरोहित हो जाने के कारण गरम जल में छोड़े गये ठंडे जल की नाई अदृष्ट है । कहीं देव, मनुष्य आदि
लिंगों में तो वह स्पष्ट ही अभिव्यक्त है और कहीं वृक्षादि लिंगों में विवेकज्ञान से शून्य तथा तत्-तत्
पदार्थों की सत्तारूप से विलासित दृष्ट है