Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 80, Verses 65–69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 80, verses 65–69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 65-69
संस्कृत श्लोक
गृहीतवासनांशानां पुष्टाभावविकारिणाम् ।
स्थितयः पञ्चकानां हि योज्याः पर्यनुयोजने ॥ ६५ ॥
वासनास्तु विपर्यस्ता इतो नेतुमितश्च ताः ।
पुंसा प्राज्ञेन शक्यन्ते सुखं पर्यनुयोजितुम् ॥ ६६ ॥
अशुभे वा शुभे वापि तेन पर्यनुयोज्यते ।
प्रबुद्धवासनं चान्यत्पञ्चकं सुप्तवासनम् ॥ ६७ ॥
यत्र पर्यनुयोगस्य फलं समनुभूयते ।
तत्र तं संप्रयुञ्जीत नाकाशं मुष्टिभिः क्षिपेत् ॥ ६८ ॥
तृणाग्रनिष्ठा मेर्वाद्याः पञ्चकानां हि राशयः ।
विवेकनिष्ठाः कीटाद्या एते स्थावरजंगमाः ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा वाणी के विषय में भी आपको आक्षेप न करना चाहिए, क्योकि वह वासनाकल्पित
विकल्प की नाई पंचकार्थनुवादी होने के कारण पराधीन बन चुकी है । किन्तु तत्-तत् विरुद्ध
विकल्पभाव से वासनांश का ग्रहण करनेवाले विकारयुक्त लिगात्मक पंचकों की केवल स्थिति के
विषय में ही आक्षेप करना चाहिए ।
अथवा हे श्रीरामचन्द्रजी, जिन्होंने वासनांश का ग्रहण किया है ऐसे परिपुष्ट विरुद्धविकारों से
युक्त पंचकं की स्थिति के विषय में ही आक्षेप करने में आपको अधिक योग देना चाहिए । अथवा
उन पंचतत्व की स्थिति का भी कोई अपराध नहीं है, क्योकि वे पूर्व पूर्वं हजारों विरुद्ध विकल्पों
की वासनाओं का अनुसरण करनेवाली हँ; चित्त को इधर-उधर दौड़ाने में समर्थ तथा चारों ओर
खूब बिखरी हुई वासनाओं के ही विषय में विरुद्ध विकल्प कल्पनाओं की जड़ खोज रहे बुद्धिमान्
पुरुष आनन्दपूर्वक आक्षेप कर सकते हैं, स्वभावादि के विषय में नहीं । देवादि शुभभाव में
प्रबुद्धवासनायुक्त तथा तिर्यक् स्थावर आदि अशुभभाव में सुप्तवासनायुक्त अन्य पंचक अवस्थित
रहता है, इसलिए वासना ही पंचकों की स्थिति में कारण है, ऐसा आक्षेप कर सकते हे । जिस वासना
के विषय में आक्षेप करने से उसका क्षयरूप फल अच्छी तरह अनुभूत होता है उसी के विषय में
आक्षेप करना चाहिए, मुट्ठी में धूलि उठाकर आकाश में नहीं फैकना चाहिए । तात्पर्य यह कि
स्वभावादि के विषय में किसी तरह के आक्षेप करनेका कोई फल नहीं हे । यही कारण हे कि वासना
का क्षय हो जानेपर पूर्णात्मलाभ होने से मेरु आदि सुवर्ण की राशियाँ भी तिनके के समान तुच्छ
मालूम पड़ने लगती हैं ओर विवेकनिष्ठ को ये सब स्थावर-जंगम आदि भी कीट, पतंग आदि के
समान अत्यन्त तुच्छ भासित होने लगते हैं