Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतत्पञ्चकबीजं तु कुण्डलिन्यां तदन्तरे ।
प्राणमारुतरूपेण तस्यां स्फुरति सर्वदा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यदा प्राणानिलो याति हृदि कुण्डलिनीपदम् । तता संविदुदेत्यन्तर्मूततन्मात्रवीजमूः ॥ (हृदय में
जव प्राणवायु कुण्डलिनी स्थानतक पहुँच जाती है, तब भीतर में भूत और तन्मात्रा की बीजभूमि संवित्
उदित होती है) इससे बुद्धिशक्तियो में स्फूर्तिप्रदातृत्व का उपपादन करते समय (भरूततन्मात्रवीजभूः)
इस अंश को स्पष्ट समझाने के लिए जो स्थूल और सूक्ष्म पंचभूतों का विचार किया गया था, उसकी
संगति दिखलाते हुए आकाशगमनादि सिद्धियो में बीजभूत प्राणाभ्यास में उपयुक्त, प्रस्तुत कुण्डलिनी
में प्राणादि की उत्पत्ति का प्रकार दिखलाते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, स्थूलशरीरात्मक पंचक के मूलाधार उस कुंडलिनी में,
जिसका हमने पहले वर्णन किया था, इस लिंगात्मक पंचक का उपादान कारण भूतसूक्ष्म सदा पांच
प्राणवायुओं के रूप से स्फुरित होता है
सर्ग सन्दर्भ
अस्सीर्वो सर्ग समाप्त इक्यायीवों सर्ग कुण्डलिनी के प्रसंग से रोगों की उत्पत्ति ओर उनके नाश के क्रम तथा सिद्धि ओर सिद्धं के दर्शन के उपाय आदि का वर्णन ।