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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 111

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 111 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 111

संस्कृत श्लोक

प्राणोऽग्निरुष्णप्रकृतिरपानः शीतलः शशी । छायातपवदित्येतौ संस्थितौ मुखमार्गगौ ॥ १११ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राण ओर अपान वायु अग्नि और चन्द्र स्वरूप हैं, यह जो पहले कहा गया था, उसका प्रकृत में उपयोग के लिए स्मरण दिलाते हैं। उष्णप्रकृति प्राणवायु अग्निस्वरूप है तथा शीतलप्रकृति अपानवायु चन्द्रस्वरूप है छाया ओर धूप की नाईं ये दोनों मुखरूप मार्ग में स्थित रहते हैं