Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 117–119
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 117–119 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 117-119
संस्कृत श्लोक
उष्णमग्निश्चिदादित्यः शैत्यं सोम उदाहृतम् ।
यत्रैतौ प्रतिबिम्बस्थौ तत्र बद्धपदो भव ।। ११७
शरीरे सोमसूर्याग्निसंक्रान्तिज्ञो भवानघ ।
तत्र संक्रान्तिकाला हि बाह्यास्तृणसमाः स्मृताः ।। ११८
संक्रान्तिमुत्तरमथायनमङ्ग सम्य-
क्कालं तथा विषुवतौ यदि देहवातैः ।
अन्तर्बहिष्ठमिव वेत्सि यथानुभूतं
तच्छोभसेऽत्र न पुनः परमभ्युपेतः ।। ११९
हिन्दी अर्थ
अब अधरिचक या अर्धपूरक से मध्य में दोनों ओर से प्राण के निरोध द्वारा बिम्ब और प्रतिबिम्ब की
तरह उनकी तुल्यरूपता कहकर धारणा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, चिदादित्य उष्ण ओर अग्निस्वरूप तथा चन्द्रमा शीतल कहा गया है जहाँ पर
अर्थात् अर्धरेचक और अर्धपूरक से अन्तराल में ये दोनों अग्नि और चन्द्र या प्राण ओर अपान
प्रतिबिम्बरूप में स्थित हैं वहाँ पर आप स्थिर हो जाइये । हे पापशून्य श्रीरामजी, जैसे वसन्त, ग्रीष्म,
वर्षा और शरद ऋतुओं में क्रमशः शीत का उष्णता से ग्रास हो जाने के कारण सोम (चन्द्र) की अग्नि
संक्रान्ति होती है ओर शरद हेमन्त तथा शिशिर ऋतुओं में क्रमशः उष्णता का शीत से ग्रास हो जाने
के कारण अग्नि की चन्द्रसंक्रान्ति होती है एवं इन दोनों की सन्धि में सूर्य की मेषादि संक्रान्ति होती
है वैसे ही इस शरीर में भी अपान की शीतता का जठराग्नि से ग्रास होने पर चन्द्रमा की अग्निसंक्रान्ति
होती है ओर प्राण की उष्णता का बाह्य शीतता से ग्रास होने के कारण अग्नि की चन्द्रसंक्रान्ति होती
हे । सूर्य की संक्रान्तियाँ तो पहले ही बतला दी गयी हैं, इसलिए हे श्रीरामजी, आप इनके विशेषज्ञ
हो जाइये, क्योकि इस शरीर के अन्दर मुख्य संक्रान्तिकाल ये ही हैं, बाह्यसंक्रान्तिकाल तो तृण के
समान कहे गये हें । हे श्रीरामजी, बाहर प्रसिद्ध संवत्सर में स्थित संक्रान्ति, उत्तरायण, दक्षिणायन,
संवत्सरात्मक काल तथा विषुवत् रेखा आदि की नाई इस शरीर के अन्दर भी स्थित संक्रान्ति,
उत्तरायण, दक्षिणायन, संवत्सरात्मक काल तथा विषुवत् रेखा आदि को देह के प्राण ओर अपान
वायु के द्वारा स्थित यदि आप योगाभ्यास के कारण प्रत्यक्ष अनुभूत घट, पटादि के समान भलीर्भोति
जानते हैं, तो योगियो की कथाओं मेँ शोभते हे । यदि मेरे उपदेश के ऊपर ध्यान न देकर कहीं
अन्यत्र प्रवृत्त हें, तव तो फिर आप नहीं शोभते