Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 62–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
काष्ठक्रकचयोः श्लेषाद्यथा छेदः प्रवर्तते ।
द्वयोः संघर्षणादग्निः स्वभावाज्जायते तथा ॥ ६२ ॥
मांसं कुयन्त्रजठरे स्थितं श्लिष्टमुखं मिथः ।
ऊर्ध्वाधःसंमिलत्स्थूलद्ध्यम्भःस्थैरिव वैतसम् ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
अगले सर्गमें इस प्रश्न का उत्तर विस्तारपूर्वक बतलाने की अभिलाषा रखते हुए उसकी भ्रूमिकारूप
से वहीं पर देह में अग्निषोमव्याप्ति का निरुपण करने के लिए प्राण और अपान वायु के संघर्ष से मध्य में
जठराग्नि की निष्पत्ति में दृष्टान्त देते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जिस तरह लकड़ी ओर अरे के संघर्ष से लकड़ी के
दो हिस्से हो जाते हैं उसी तरह प्राण और अपानवायु के संघर्ष से जठराग्नि स्वभावतः उत्पन्न हो
जाती है