Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 85
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 81, verse 85 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 85
संस्कृत श्लोक
एकनाशे द्वितीयस्य यद्भावो दिनरात्रिवत् ।
कार्यकारणभावोऽसौ विनाशपरिणामजः ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरे का उपपादन करते हैं।
जहाँ एक का नाश होनेपर दूसरे की दिन और रात की नाई उत्पत्ति होती है वह कार्य-कारणभाव
विनाशरूप परिणाम से उत्पन्न कहा जाता है