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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 82, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

दृढभाववशादन्तरस्थीन्याप्नोति सा ततः । मातृगर्भनिषण्णेषु सुसूक्ष्मेवाङ्कुरस्थितिः ॥ १२ ॥ यथाभिमतमाकारं प्रमाणं वेत्ति राघव । जीवशक्तिरवाप्नोति सुमेर्वादि तृणादि च ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

हड्डी आदि की कल्पना का प्रकार बतलातेहै। ओर उसके बाद वही कुण्डलिनी दृढ़ भावना के वश से भीतर हड्डी आदि को इस तरह प्राप्त हो जाती है, जिस तरह माता के गर्भ में विद्यमान कललों में (५) स्थित अस्थि, हाथ, पैर आदि अंकुरो की (भ्‌) कलल = गर्भाशय में रज और वीर्य की वह अवस्था, जिसमें एक पतली ज्ञिल्ली-सी बन आधारभूत अगम्य अत्यन्त सूक्ष्म बीजशक्ति। हे राघव, अपनी इच्छा के अनुसार वह जीवशक्ति सुमेरु आदि के तुल्य महान्‌ या तृण आदि के तुल्य लघु आकार या परिमाण की भावना करती है तदनुसार सुमेरु आदि या तृणादिरूप हो जाती है