Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, Verses 26–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 83, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 26-28
संस्कृत श्लोक
गुरूपदेशं च विना नात्मतत्त्वागमो भवेत् ।
केन चिन्तामणिर्लब्धः कपर्दान्वेषणं विना ॥ २६ ॥
तत्त्वस्यास्य महार्थस्य गुरूपकथनं गतम् ।
अकारणं कारणतां मणेरिव कपर्दकः ॥ २७ ॥
पश्य राघव मायेयं मोहिनी महतामपि ।
अन्यदन्विष्यते यत्नादन्यदासाद्यते फलम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
तथापि (आचार्यवान् पुरूषो वेद” इत्यादि श्रुति से गुरु का उपदेश आवश्यक है।
फिर भी गुरु के उपदेश के बिना आत्मतत्त्व की प्राप्ति भी नहीं होती, क्योकि कोडी की खोज के
बिना चिन्तामणि की प्राप्ति किसने की | इस महान् अर्थरूप तत्त्व मेँ गुरु का उपदेश कारण न होता हुआ
भी कारणता को उस तरह प्राप्त हो गया है, जिस तरह चिन्तामणि का कौड़ी | तात्पर्य यह है कि कौड़ी
के अन्वेषण की नाईं मनन द्वारा गुरु का उपदेश, कारण न होता हुआ भी, अवश्य फल के दर्शन से
कारणता को प्राप्त हो गया है। हे राघव, देखिये-यह माया महात्माओं को भी मोहित करनेवाली है। बड़े
यत्न से अन्य वस्तु का अन्वेषण किया जाता है और फल प्राप्त होता है कोई दूसरा ही