Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, Verses 1–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 84, verses 1–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 1-14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततः शिखिध्वजो राजा तत्त्वज्ञानपदं विना ।
आजगाम परं मोहं तमोन्धत्वमिवाप्रजाः ॥ १ ॥
दुःखाग्निदीपितमना मनागपि विभूतिषु ।
तास्वभीष्टोपनीतासु न रेमेऽग्निशिखास्विव ॥ २ ॥
एकान्तेषु दिगन्तेषु निर्झरेषु गुहासु च ।
आजगाम रतिं जन्तुर्मुक्तेषुर्व्याधतो यथा ॥ ३ ॥
राघव त्वमिवाशेषाः सान्त्वानुनयबोधनैः ।
प्रार्थितः कार्यते भृत्यैर्महीपो दिवसक्रियाः ॥ ४ ॥
नित्यमुद्दामवैराग्यः परिव्राडिव शान्तधीः ।
खिद्यते च महाभोगान्स भोक्तुं च श्रियं स्थितः ॥ ५ ॥
ददावतितरां दानं गोभूमिकनकादिकम् ।
देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च स्वजनेभ्यश्च मानद ॥ ६ ॥
चचार च तपः कर्तुं कृच्छ्रचान्द्रायणादिकम् ।
परिबभ्राम तीर्थानि वनान्यायतनानि च ॥ ७ ॥
स तथापि विशोकत्वं न मनागपि लब्धवान् ।
अनिधानां खनन्भूमिं निधानार्थी निधिं यथा ॥ ८ ॥
रात्रिंदिवं महानेष शुष्यत्येव कृशानुना ।
चिन्तया चिन्तयामास संसारव्याधिभेषजम् ॥ ९ ॥
चिन्तापरवशो दीनो राज्यं स्वस्य विषोपमम् ।
महाविभवमप्यग्रे नापश्यत्खिन्नया धिया ॥ १० ॥
अथैकदैकान्तगतां चूडालामङ्कमागताम् ।
इदं मधुरया वाचा समुवाच शिखिध्वजः ॥ ११ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
भुक्तं राज्यं चिरं कालं भुक्ता विभवभूमयः ।
अधुनास्मि विरागेण युक्तो गच्छामि काननम् ॥ १२ ॥
न सुखानि न दुःखानि नापदो न च संपदः ।
क्रोडीकुर्वन्ति तन्वङ्गि मुनिं वननिवासिनम् ॥ १३ ॥
न देशभङ्गसंमोहो न संग्रामे जनक्षयः ।
राज्यादप्यधिकं मन्ये सुखं वननिवासिनाम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, उसके बाद राजा शिखिध्वज तत्त्वज्ञानरूप विश्रान्तिस्थान
के बिना परम मोह को उस तरह प्राप्त हो गया, जिस तरह सन्ततिशून्य पुरुष शोकादिरूप तमसे
अन्धता को । दुःखरूप अग्नि से सन्तप्त मनवाला वह शिखिध्वज सामन्त आदि प्रियवर्ग द्वारा लाई गयी
रत्नादि बहुमूल्य सम्पत्तियां मे, अग्निशिखा की नाई, तनिक भी रमण नहीं करता था । व्याध द्वारा बाण
छोड़े जाने पर भी भाग्यवश घायल न हुआ हरिण व्याध से डरकर जैसे एकान्त स्थल में निवास के लिए
प्रेम करता है वैसे ही वह राजा एकान्त दिगन्तं मे, निर्झरों में और गुहाओं में निवास के लिए प्रेम करने
लगा। हे राघव, तुम्हारे समान सान्त्वन, अनुनय एवं बोधन से चाकरों द्वारा प्रार्थित वह राजा समस्त
दिवस कर्म का सम्पादन करता था। प्रतिदिन उसका वैराग्य तीव्रतम होता जाता था, वह एक तरह से
संन्यासी -सा स्थित था, उसकी बुद्धि अत्यन्त शान्त थी, इसलिए बड़े-बड़े भोग और विषयों का उपभोग
करने में उसका चित्त खिन्न हो जाता था । हे मानद, उसने गो, भूमि, सुवर्णं आदि का देवताओं,
ब्राह्मणों ओर स्वजनों को खूब दान दिया । तप करने के लिए कृच्छ, चान्द्रायण आदि व्रतो का आचरण
किया। उसने तीर्थो में, वनों में और आश्रमो में परिभ्रमण किया | जिस प्रकार निधि चाहनेवाला पुरुष
निधिशून्य भूमि को खोदकर निधि प्राप्त नहीं करता, उसी प्रकार वह राजा तप एवं अरण्यादि भ्रमण
करने पर भी शोक शून्य स्थिति को तनिक भी प्राप्त नहीं हुआ। रात-दिन की चिन्तारूपी अग्नि से वह
महान् राजा शिखिध्वज भी सूखने लगा ओर संसाररूप व्याधि का ओषध विचारने लगा । चिन्तापरवश
होकर वह दीन बन गया । अपना राज्य उसे विष के सदृश मालूम पड़ने लगा। सामने बड़े-बड़े रखे गये
विभवो को भी खिन्न बुद्धि के कारण वह नहीं देख पाता था । अनन्तर एकान्त मेँ स्थित और अंकारूढ
चूडाला से वह शिखिध्वज राजा मधुर शब्दों से यह कहने लगा। शिखिध्वज ने कहा : भद्रे, चिरकालपर्यन्त
राज्य का उपभोग किया । तरह तरह के विभवपूर्णं पदों का भी भोग किया । अब मैं विराग से युक्त हो
गया हूँ, इसलिए अरण्य की ओर जाता हू । हे तन्वंगि, अरण्य निवासी मुनि को न सुख, न दुःख, न
आपत्तियाँ और न सम्पत्तिर्यो ही कुछ कर पाती हैँ । न तो उन्हे देश के विनाश से कोई मोह होता है ओर
न संग्राम में जन का क्षय ही होता है, इसलिए अरण्यवासी मुनियों के सुख को राज्य की अपेक्षा भी मैं
अधिक मानता हूँ
सर्ग सन्दर्भ
तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवाँ सर्ग॑ शिखिध्वज का वैराग्य, चूडाला का आश्वासन, रात में राजा शिखिध्वज का सोई हुई अपनी प्रिया को छोड कर चुपचाप जंगल में भाग जाना और मन्दराचल में स्थिति - इन सबका वर्णन ।