Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 84, Verses 28–30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 84, verses 28–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 28-30
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
अलमुत्पलपत्राक्षि विघ्नेनाभिमतस्य मे ।
विद्धि मां गतमेवेतो दूरमेकान्तकाननम् ॥ २८ ॥
बाला त्वमनवद्याङ्गि नागन्तव्यं वनं त्वया ।
पुंसामपि हि मृद्वङ्गि दुर्विगाह्यो वनाश्रयः ॥ २९ ॥
समर्था न वनावासे योषितः कठिना अपि ।
कानने पुष्पमञ्जर्यः सोढुं शस्त्रालिमक्षमाः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह विचलित किये जानेपर भी अविचलित वैराग्य से सम्पन्न राजा शिखिध्वज अपनी प्रियभार्या
चूडाला से अनुनय करते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे कमलपत्राक्षि, मेरे अभिमत कार्य में विघ्न मत डालो । अब तुम मुझे
यहाँ से दूर एकान्त जंगल में गया हुआ ही समझो | हे अनिन्दित अंगवाली, तुम अभी बिलकुल बच्ची हो,
तुम्हें जंगल में नहीं आना चाहिए, क्योकि हे कोमलांगि, जंगली प्रदेश में प्रवेश पुरुषों के लिए भी अति
कठिन हे । कठोर से भी कठोर अंगवाली स्त्रियाँ जंगल के निवास में किसी तरह समर्थ नहीं हो सकतीं,
क्या कहीं उपवन मेँ उत्पन्न पुष्पमंजरियाँ शस्त्रो को सहन कर सकती हैं ?