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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 76–81

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 85, verses 76–81 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 76-81

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । जानासि भगवन्सर्वं देवस्त्वं कोऽत्र विस्मयः । श्रियैव लोकोत्तरया ज्ञायसे चिह्नरूपया ॥ ७६ ॥ एतान्यङ्गानि ते चन्द्राद्धटितानीति मे मतिः । अथवा किं समालोकादमृतेनेव सिञ्चसि ॥ ७७ ॥ अस्ति मे दयिता कान्ता पाति मद्राज्यमद्य तत् । तवेव तस्या दृष्टानि तान्यङ्गानीह सुन्दर ॥ ७८ ॥ उपशान्तं च कान्तं च वपुरापादमस्तकम् । श्रृङ्गं शुभ्राम्बुदेनेव पुष्पेणाच्छादयामुना ॥ ७९ ॥ निष्कलङ्केन्दुसंकाशमङ्गमादित्यतेजसा । मन्ये ते ग्लानिमायाति सुमनःपत्रपेलवम् ॥ ८० ॥ देवार्चनायोपचितमिदमित्थं सितं मया । अङ्ग त्वदङ्गसङ्गेन तत्प्रयातु कृतार्थताम् ॥ ८१ ॥

हिन्दी अर्थ

राज्य का परित्याग और मोक्ष के लिए तपस्या का आचरण - इन दोनों की अज्ञात दशामे प्रशंसा नहीं हो सकती, इसलिए तपस्या द्वारा उसमें सर्वज्ञता की सम्भावना करता हआ राजा शिखिध्वज रूपादिसम्पत्ति से उस ब्राह्मणकुमार की प्रशंसा करता है । राजा शिखिध्वज ने कहा : भगवन्‌, आप देव हो, सब कुछ जानते हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? अपने लोकोत्तर चिहयुक्त सौन्दर्य से ही आप महाप्रभावशाली मालूम पड़ते हो मेरी बुद्धि तो यह कह रही है कि ये आपके सब अंग अमृतमय चन्द्रमा से विरचित हैँ अथवा मेरा अधिक कहना व्यर्थ है, आप अपने सम्यक्‌ वीक्षण और देह की कान्ति से मानों अमृत से मुझे सींच रहे हो । हे सुन्दर, मेरी प्रियपत्नी है, जो आजकल मेरे उस राज्य की रक्षा कर रही है। उसके समान आपके ही वे अंग मुझे यहाँ दीख पड़े हैं। मस्तक से लेकर पैर तक यह आपका उपशान्त तथा कमनीय शरीर है, इसे आप मेरे द्वारा दी गयी माला से, शुभ्र मेघ से मेरुशिखिर की नाई, ढक दीजिये । कलंकशून्य चन्द्रमा के समान तथा पुष्पदल की नाई कोमल आपका यह अंग सूर्य के तेज से ग्लानि को प्राप्त हो रहा है, ऐसा मैं समझता हूँ। हे सुन्दर, यह ऐसी सफेद फूल की माला मैंने देवार्चन के लिए गुँथी है, वह आपके अंग के संग से कृतार्थता को प्राप्त हो जाय