Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 86, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 86, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
एषोऽहमित्यखिलमेव यथानुभूतं ते वर्णितं ननु मया वनवासतज्ज्ञ ।
सन्तो हि संकथनमार्यजनोत्तमेषु निर्मान्त्यलं सुभगसंव्यवहारदक्षाः ॥ २८ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम ।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
अव अपनी उक्ति का उपसंहार करते हैँ ।
वनवास के गुणों को तथा उसके फल चित्तशुद्धि को जाननेवाले हे महात्मन्, आपने जो कुछ पूछा,
उन सबका ही मैंने अनुभव के अनुसार आपसे वर्णन किया । हे भाग्यशालिन्, उत्तम आर्यजनों के प्रश्न
करने पर सत्पुरुष संभाषण करते ही हैं, क्योकि वे आर्यजनों के साथ प्रश्न ओर उत्तर करने के व्यवहार
में बड़े ही पटु होते हे । वाल्मीकिजी ने कहा : भद्र, तदन्तर वसिष्ठ मुनिजी के ऐसा कहने पर दिवस बीत
गया, सूर्य भगवान् अस्ताचल की ओर चले गये, वसिष्ठ मुनि को नमस्कार कर सायंकाल की विधि के
लिए सभा स्नानार्थ चली गयी ओर रात बीत जानेपर सूर्य की किरणों के साथ-साथ ही सभामण्डप में
वह फिर आ गयी