Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 87, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 87, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
भ्रमन्नपि दिगन्तेषु चरन्नपि परंतपः ।
नासादयामि विश्रान्तिमेकां निधिमिवाधनः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
चारों ओर दिशाओं में घूम
भी रहा हूँ, कठोर तप भी कर रहा हूँ, फिर भी जैसे निर्धन निधि प्राप्त नहीं करता, वैसे ही मैं असल
शान्ति प्राप्त नहीं कर रहा हूँ