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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

विद्याविद्यादृशौ त्यक्त्वा यदस्तीह तदस्ति हि । प्रतियोगिव्यवच्छेदवशादेतद्रघूद्वह ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका हो कि विद्यादृष्टि से बाध्य होने के कारण अविद्या-द्ृष्टि का त्याग भले ही हो, परन्तु उसकी बाधिका विद्या-द्ष्टि का त्याग किससे होगा ? तो इस पर कहते है । हे रघूकुलभूषण, बाध के द्वारा अविद्या का अस्तित्व मिट जानेपर अविद्यानिरूपित (अविद्यानिष्ठ बाध्यता का आश्रय लेकर आनेवाली) बाधकता की सिद्धि ही नहीं हो सकती और विद्यमान प्रतियोगी के अधीन होने से व्यावृत्ति की (भेद की) भी प्रसिद्धि नहीं हो सकती, अतः विद्या और अविद्या-दृष्टि का अस्तित्व ही नहीं, इसलिए आप अवशिष्ट ब्रह्मरूप पदपर सुस्थिर हो जाइए