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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

मिथः स्वान्ते तयोरन्तश्छायातपनयोरिव । अविद्यायां विलीनायां क्षीणे द्वे एव कल्पने ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामभद्र, उन परस्पर विरुद्ध विद्या ओर अविद्या दोनों मे से अविद्या का बाध से चैतन्य में विलय हो जाने पर उक्त दोनों कल्पनाएँ क्षीण हो जाती हैं और उनका चैतन्य में अवस्थान हो जाता है, फिर परिपूर्णानन्दात्मक प्राप्तव्य चैतन्य परब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है