Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चिन्तयेति गते वृद्धिं संकल्पग्रहणे शनैः ।
वात्ययेव वनस्पन्दे त्यागः प्रोड्डीय ते गतः ॥ १३ ॥
त्यागिता स्यात्कुतस्तस्य चिन्तामप्यावृणोति यः ।
पवनस्पन्दयुक्तस्य निःस्पन्दत्वं कुतस्तरोः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चिन्ता से
संकल्पग्रहण के वृद्धिगत हो जाने पर आपका वह सर्वत्याग उड़कर कहीं उस तरह चला गया, जिस तरह
आँधी से जंगली वृक्षों के हिल जाने पर उनके पक्षी वहाँ से उड़कर कहीं अन्यत्र निर्वात प्रदेश में आश्रय
पाने के लिए चले जाते हैं