Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
निश्चिन्तत्वं परं सर्वं त्याग आदाय ते गतः ।
आमन्त्र्यापूजितो जन्तुः स दुःखं न करोति किम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
उड़कर भाग रहा त्याग सर्वत्याग के फ़ल निश्विन्तता को लेकर मानो चला गया, यह उत्प्रेक्षा
करते हैं।
हजारों प्रार्थना करने के बाद आया हुआ आपका त्याग पूजित न होने से आपकी उत्कृष्ट सारी
निश्चिन्तता लेकर चला गया, क्योकि निमन्त्रण देकर बुलाया गया प्राणी पूजित न होने पर क्या वह
दुःख नहीं देता । तात्पर्य यह है कि दक्षप्रजापति के यज्ञ में बिना निमन्त्रण के पहुँचे हुए पूज्य की पूजा न
होने पर जब अनर्थ प्राप्ति प्रसिद्ध ही है, तब हजारों प्रार्थनाओं से बुलाये जानेपर आये हुए पूज्य की
पूजा न होने पर अनर्थ की प्राप्ति होती है, इसमें तो कहना ही क्या ? जिसका अनादर हुआ वह अवश्य
दुःख उत्पन्न करेगा ही, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है