Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
अभाविता भवन्त्यन्तर्लूनाः संविद्वलेन ते ।
असंसक्तमना मौनी शान्तवादविचारणः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का ही जीवन्युक्तो में लक्षणरूप से दिगृदर्शन कराते है।
जिसका मन किसी विषय मेँ आसक्त नहीं है, जिसका अनुचित वाग्व्यापार सर्वदा निवृत्त रहता
है, जो जय-पराजय की अभिलाषा से शून्य होकर प्रशान्त वाद विचार में निरत रहता है, जो प्राप्त हुए
कार्य को कर डालता हे उस पुरुष की चित्तरूपी लता भीतर विच्छिन्न हो जाती हे